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शिरीष - दस क्षणिकाएँ
 

१-
तन शिरीष का पेड़
मन शिरीष का फूल,
समूचा शिरीष
स्वयं में एक स्कूल!

२-
बेटी
तुम मत बनना
गेंदा या गुलाब
तुम बनना शिरीष का फूल
अविचल रहना,
आगे बढ़ना!

३-
दुःख-दर्द मिटाओ
सबके काम आओ,
शिरीष हो जाओ!

४-
न उफ, न आह
न चिलकती धूप की परवाह
अपने काम में
इतना खो गये,
प्रिय तुम सचमुच
शिरीष हो गये!

५-
सपने देवदार सरीखे
हौसले शिरीष-से,
सब कुछ मिला है मुझे
माँ-बाप के आशीष से!

६-
बहारें संग झूमेंगी
मंज़िल कदम चूमेगी
प्रकृति से सीखो,
शिरीष होकर
मन जीतो!

७-
शिरीष ने कहा-
तुम भी तपो, औषधि बनो
सहो हँसकर
हर अड़चन,
तब भरो-
दंभ/इंसानियत का!

८-
जीत-हार से परे
संकल्पशील बनो
बाधाओं के समक्ष तनो
माँ ने दिया आशीष,
बेटा हो जाओ शिरीष!

९-
पिता
'शिरीष-वृक्ष'
माँ
'शिरीष-सुमन'
संघर्ष
पोर-पोर,
बेटे
उत्कर्ष की ओर!

१०-
जाने कौन-सी
'एलर्ज़ी' लील गयी
'रिश्तों से मिठास',
चलो चलें
शिरीष के पास!

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'  
     
१५ जून २०
१६

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