अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

वह ध्यानमग्न अवधूत
 

वह ध्यानमग्न अवधूत बना
हौले हौले से डोले रे।
प्रचंड धूप में खड़ा शिरीष
मनोभाव ना खोले रे

आई देखो रुत बासंती
शिरीष ले रहा अँगड़ाई
पावस की रिमझिम बूँदों में
सावन से करता कुड़माई

मनभावन खुशबू से लिपटे
श्वेत गुलाबी चोले रे

क्षीण तंतु हैं बिखरे बिखरे
कैसे सहें अलिपद का भार
जीवटता की प्रतिमूरत वो
आँधियों संग करे तकरार

मृदु कठोर का अद्भुत संगम
मौनी बनकर बोले रे

सूखे बीज बजे झाँझर से
लम्बी लम्बी फलियों में
सघन छाँव अरु भाव अनूठे
भरता शिरीष नित कलियों में

नवजात पालनों में टँगकर
शुद्ध पवन यह तोले रे

चित्रकला में शाकुन्तल को
नृप ने जब जब साकार किया
रह जाता कुछ छूटा छूटा
जिसपर चिंतन सौ बार किया

बन कर्णफूल उकरे शिरीष
लगते कुण्डल भोले रे

- ऋता शेखर मधु

१५ जून २०
१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter