अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

वो शीशम की छाँह
 
बुला रही है
हमको फिर से
वो शीशम की छाँव प्रिये

चलो त्याग दें आज अभी से
लोभ कपट की क्यारी को
चलो सजाएँ अपने घर-सा
वसुधा की फुलवारी को
थकी हुई
आसों को हासिल
हो जाए फिर ठाँव प्रिये

डर लगता है राजपथों के
विषधर साँप-सँपेरों से
डर लगता है सुलग रहे
हरपल नफरत के ढ़ेरों से
चलो बसाएँ
अलग कहीं इन-
सबसे अपना गाँव प्रिये

चलो बहा दें दरिया में
रंजिश के सब हथियारों को
चलो बुझा दें मानवता के
दुश्मन सब अंगारों को
राजनीति के
लू में जलने
लगे हैं अपने पाँव प्रिये

- शंभु शरण मंडल 
१ मई २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter