अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

मैं शीशम का वृक्ष
 
मैं शीशम का वृक्ष, बन्धुवर
मैं अल्हड़ अलमस्त फकीर

मैं हूँ मीत धरा का, साथी,
लग न कभी पाया गमलो में
राह किनारे खड़ा मिलूँगा
वास नही भवनों, महलों में
भीषण झंझा, गर्जन-तर्जन
विचलित मुझे न कर पाते हैं
ऋतुओं के हर क्रम-व्यतिक्रम में
मैं लिखता अपनी तकदीर

ज्ञानी विज्ञानी बतलाते
कितना वंश पुराना मेरा
वाल्मीकि तुलसी से पूछो
प्रियवर पता ठिकाना मेरा
श्रृंगबेरपुर से सुन लेना
गाथायें मेरे पुरखों की
जिनकी शुभ शीतल छाया में
बैठे बनवासी रघुवीर।

सभी सुखी हों सभी निरामय
यही पाठ पढ़ता रहता हूँ
जन जन की पीड़ा हरने को,
हँस कर सारे दुःख सहता हूँ
मैंने सिर्फ लुटाना सीखा
माँगा नहीं किसी से कुछ भी
परमारथ है धरम हमारा
यही सिखा कर गये कबीर

- शिवजी श्रीवास्तव
१ मई २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter