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शीशम तुम्हारे पात
 
बीच फागुन में झरे शीशम तुम्हारे पात
लाज से पानी हुआ
कोरा बदन

गुनगुनी सी धूप ने मन को छुआ
आह पहली बार तन को क्या हुआ
कोपलें हर पोर अँखुवाने लगीं
उर थाम-
झूमकर धानी हुआ
कोरा बदन

तुम सदा तपती दुपहरी में हँसे
दिख रहे उतना ही धरती में धँसे
आँधियाँ तूफान कब कुछ कर सकीं,
हर बार-
जीतकर मानी हुआ
कोरा बदन

साँझ ढलते ही महक आने लगी
एक मदमाती गमक छाने लगी
देख पिछवारे खिलीं सिसवारियाँ
नवजात,
रात की रानी हुआ
कोरा बदन

खिड़कियाँ पल्ले व फर्नीचर सजे
जिन्दगी को दे रहे स्वर्गिक मजे
देह के इस दान से ऊँचा हुआ
है माथ-
इस कदर शानी हुआ
कोरा बदन

- उमा प्रसाद लोधी
१ मई २०१९

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