अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       ठंडा जलजीरा

 
लबों पे आ गया मेरे अचानक ठंडा जल जीरा
सुकूँ दे रूह को मेरी कहाँ अब ऐसा जल जीरा

पुदीना, नीबू, जीरा, है नमक का मेल भी इस में
छुपा हर घूँट में इस के है अमृत जल सा जल जीरा

भरी गर्मी में ठंडी सी जो कोई छाँव आ जाए
लिपट जाती है तन से छाँव तब ही भाता जलजीरा

नहीं बाजार की है शानो शौकत बात लज़्ज़त की
बसा है सादगी में हर ज़ुबाँ पेअपना जल जीरा

कि लेकर याद बचपन की सभी के घूंट में उतरे
दिलों को छू सके ऐसा बना , है मेरा जल जीरा

किसी महफ़िल में मय की प्यास जब बढ़ने लगे 'आभा'
तभी भा जाए सब को है बना आला सा जल जीरा

- आभा सक्सेना 'दूनवी'
१ मई २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter