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         जलजीरे सा प्यार

 
आम पना की मटकियाँ चल दीं ठेले बैठ
ललचाती आँखें कहें पी ले मत तू ऐंठ

खट्टा मीठा हो गया अपना भी व्यवहार
रिश्ते होते फालसे जलजीरे सा प्यार

जलजीरे को मिल गय जब नींबू का साथ
चटखारे लगने लगे घर घर हाथों-हाथ

जलजीरे से रच गया राम दास का लंच
तपती गर्मी साथ में प्याज मिर्च का क्रंच

लू लंपट ने जब किए मनमानी के वार
जलजीरा भी हो गये जनता के हथियार

- धीरेन्द्र द्विवेदी
१ मई २०२६

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