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         गर्मी में जलजीरा

 
जलजीरा, रस ईख का, लस्सी भरे गिलास
गर्मी में अमृत लगें, इन से बुझती प्यास

गरमी के संत्रास से, पीड़ित पेड़, मकान
जलजीरे को ढूँढ़ता, चहुँदिश हर इनसान

गरमी में व्याकुल सभी, धरा हुई बेनूर
जलजीरे का पान कर, कभी न हों मजबूर

पंछी दुबकें नीड़ में, वनचर पहुँचें छाँव
भरी दुपहरी ढूँढ़ती, जलजीरा किस ठाँव

जेठ मास में दोपहर, हो जाती सुनसान
घर में जलजीरा सरस, वन होते वीरान

- आचार्य विजय तिवारी 'किसलय'
१ मई २०२६

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