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         पना पेय की रानी

 
काया की गरमी को मारे पना पेय की रानी
लू पर भारी पड़ जाता जब पिसे पुदीना धानी
स्वाद बढ़ाए ठंडक देता पाचन में गुड़कारी
कच्ची अंबिया खट्टी खट्टी
मुँह में लाए पानी

अंबुआ डाली बौर लद गए आँधी अंधड़ झारें
आम पकाने आई रिमझिम बुदियों की बौछारें
छोटी छोटी कच्ची अंबिया क्वैले पर जब पकती
तब पानी में घुल कर सारा सार रसीला करती
छः ऋतुओं में आमों वाली
ऋतु है ग्रीष्म सुहानी

सूरज की किरणें जब बरसें आग बबूला बन कर
ठंडा ठंडा पेय बचाए हमें सहज ही तन कर
लू के चलें थपेड़े जब जब हवा उगलती शोले
जीरा पानी हींग नमक काला लें अम्मा बोले
गरम गरम मौसम में इसकी
नहीं मिलेगी सानी

तीखा-तीखा खट्टा-खट्टा मीठा-मीठा रस है
पी कर मन हो तृप्त पड़े ठंडक ऐसा चौकस है
पीकर घर से निकल पड़े जो लू दूरी साधेगी
रोग न फटकेगा उनको तन सेहत को बाँधेगी
आम पना के गुड़ अद्भुत हैं
महिमा सबने जानी

- सुधा अहलुवालिया
१ मई २०२६

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