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   जलजीरा- जीवन का भूगोल व्याकरण

 
जलजीरा रस-रचना है जीवन की सच्चाई है
घूँट भरा जिसने भी इसका जान गया गहराई है
इमली जैसे कसक अधूरी मन के कोने पलती है
बीते कल की धूप-छाँह में चुपके-चुपके जलती है

हरा पुदीना आशा ताज़ी साँसों को हरिया जाए
थके हुए इस राही मन को छूकर फिर से हर्षाए
काला नमक एक चुटकी सच का स्वाद जगाए है
झूठे भरमों से आगे बढ़ मन अपनी राह बनाए है

भुना जीरा अनुभव की गाथा आँच में तप-तप निखरा है
समय की धार में बहकर ज्यों हर दिन मन ये निखरा है
मीठा उतना जितना हँसना बिना वजह भी आ जाए
वरना चीनी भी ज़्यादा हो तो स्वाद सभी बिगड़ा जाए

तीखा थोड़ा चेत जगाने नींद पुरानी तोड़े
जड़ता की जमती परतों को एक झटके में तोड़े
जीवन का भूगोल-व्याकरण जलजीरा रस-रचना है
घूँट-घूँट में संतुलन का ये शांत अनकहा दर्शन है

- भावना सक्सैना
१ मई २०२६

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