अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

         साथ तुम्हारा

 
सूखी बंजर धरती पर जो
उमड़े घुमड़े
उन बूँदों की शिरकत सा है
साथ तुम्हारा
तपती लू में
ठंडे ठंडे शरबत सा है
साथ तुम्हारा

गर्म जेठ की दोपहरी
सा ताप दिखाए जीवन
संघर्षों ने सुखा दिया है
भीतर का हर सावन

ऐसे जिद्दी मौसम में भी
तनी हुई जो
उस छतरी की हिम्मत सा है
साथ तुम्हारा

हर दिन हर पल दुनिया दारी
विलोमार्थ सिखलाती
जहाँ आस छाया की होती
वहीँ धूप बरसाती

खट्टे खट्टे नींबू पानी
में चीनी की
मीठी मीठी नेमत सा है
साथ तुम्हारा

पड़े थपेड़े गर्म हवा के
आकुल मन घबराये
कहाँ चैन के झोंके गायब
जब ये समझ न आये

तब उस अकुलाये अंतस को
ठंडाई में
केसर की सी बरकत सा है
साथ तुम्हारा

- निशा कोठारी
१ जून २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter