अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

भुट्टे आए बड़े रसीले






 
भुट्टे आये बड़े रसीले
दाने जिनके पीले-पीले

चूल्हे सिगड़ी गरम गरम हैं
भुट्टे देखो नरम नरम हैं

सिंकने पर खुशबू है आती
खाने को यह जी ललचाती
थोडा नींबू नमक लगाओ
चबा चबा कर इनको खाओ

दादा जी के दाँत नहीं हैं
उनको देखो नहीं सताओ
दूध भरे यह दाने न्यारे
बारिश में लगते हैं प्यारे

मोती से ये जड़े हुए हैं
इक कतार में खड़े हुए हैं
मुँह पर मूँछें रखें सिकन्दर
हरे भरे कपड़ों के अंदर

दाने मक्का के पक जाते
पॉप-कॉर्न हम इनके खाते
इनके बनते हैं पकवान
मक्का खूब उगाए किसान

- घनश्याम मैथिल अमृत

१ सितंबर २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter