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वो भुट्टे के दाने






 
वो बारिश की बूँदे वो भुट्टे के दाने
कहाँ मेरी क़िस्मत जगेगी न जाने

मुझे इन हवाओं ने पागल बनाया
न तूफ़ान आया न सागर हिलाया
बदलते रहे
वक़्त रहते ठिकाने

उमर खट गई दर्द रिसता रहा पर
ये तालाब था काई वाला यहीं पर
यहीं पर कहीं
दफ़्न हैं कुछ फ़साने

इन्हीं रास्तों ने था चलना सिखाया
यहीं पर बहुत ठोकरों ने गिराया
संभलते रहे
चोट खाकर दीवाने

जो सीली सी ख़ुशबू थी ठेले किनारे
नमक नींबू चटखारे के थे वे शिकारे
किधर खो गये है
वो गुज़रे ज़माने

सिहरता हुआ काँपता सा रहा तन
मगर भीगता और भिगोता रहा मन
कहाँ उड़ गई
पीली छतरी न जाने

- रंजना गुप्ता
१ सितंबर २०२०

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