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        दिन लौटे हैं

 
नये रंग के नये भाव के
मौसम के सुरमई गाँव से
दिन लौटे हैं धूप- छाँव के

चैत मास की खुली पिटारी
उम्मीदें चढ़ गयीं अटारी
छोड़ गया फागुन आँखों में
जाते- जाते नयी खुमारी
लिपट रहे मन के आँचल से
अनचीन्हे रिश्ते लगाव के

चौपालों की बढ़ी रौनके
धुनक उठी उत्सवी ढोलके
पूरी हुयी मन्नतें मन की
घर लौटे हैं दिन खुशियों के
गली- गली डूबी बतरस में
चर्चे निकले घर- गिराव के

फुदक रही है भरी- दुपहरी
इच्छाओं की चपल गिलहरी
गुलमोहर की घनी छाँव में
बैठ ऊँघती धूप सुनहरी
मुस्कानों की उड़ी तितलियाँ
धागे सब टूटे तनाव के

मौसम बुनता ताने- बाने
गिरे टूट कर पात पुराने
फिर नूतन परिधान पहनकर
जंगल लगे झूमने -गाने
आवारा मदहोश हवाएँ
सर- सर भागें बिना पाँव के

लहर- लहर लिख रही कहानी
मचल उठा नदिया का पानी
मौन तटों पर लगी टहलने
सुधियाँ आकर नयी- पुरानी
मुखर हुए हैं सुर कल-कल के
पाल खुले फिर बँधी नाव के
दिन लौटे हैं धूप छाँव के

- मधु शुक्ला
१ अप्रैल २०२६

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