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        भोर हो गई

 
चैत मास के गगनांचल
नयी नवेली उतर रही है भोर सुहानी

तारों की छैंया में जागे सपने मन के
चाँद थका सा मद्धम मद्धम
वहीं सो गया, रात ढली उम्मीदों वाली
और कहीं से टेर लगाती
दिप दिप करती भोर किरन की
चैत मास के गगनांचल में
धीरे धीरे उतर रही है भोर सुहानी

तरु शिखरों पर चहके खग कुल
नव प्रभात के गीत रचाते
मदिर मंद गति पवन झकोरे
हिला रहे पुष्पिता डालियाँ
और सौरभित चपल समीरण
कलियों के कानो में चुपचुप
धीरे धीरे उतर रही है भोर सुहानी

स्वर्ण-किरण की ओढ चुनरिया,
शर्माती सी,बल खाती सी
मुस्कानों के रथ पर बैठी
नाच रही है खलिहानों में
घर आंगन में, चौबारों में
पावनता ले चैत मास की
धीरे धीरे उतर रही है भोर सुहानी

अलसायी सी नींद भरी आँखें जागी‌ हैं
निरख रहीं उत्सुक नयनों से
कौन आ गया, मन के आँगन
कैसा अद्भुत समाँ बँधा है
चित्रलिखित सा मन रुका हुआ है
भ्रम के मोहक जाल तोड़ती
धीरे धीरे उतर रही है भोर सुहानी

- पद्मा मिश्रा
१ अप्रैल २०२६

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