अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        चैत माह है आया

 
अमराई में कोयलिया चैती गीत सुनाती
महुआ घटवारिन सुगंध घट
माथे पर ले आती

सम्वत्सर की डलिया में गेंदा अड़हुल मुस्काये
जन्मदिवस यों मना सृष्टि का मंगल दीप सजाए
फागुन के दिन गए देखकर
धरती भी गरमाती

हर घर में गुंजित होता है रघुनन्दन का सोहर
ध्वज नारंगी लहराया लेकर हनुमत की मोहर
ठंडाई की बोतल में होली
भी है हरसाती

खेतों में तैयार खड़ी सरसों की पकती डाली
सूरजमुखी बीज ने अब जायद फसलें पा ली
चैती छठ में परवैतिन सूरज को
घर में लाती

नीमों की फुनगी पर कोमल पात पुनः अँखुआये
त्वचा रोग से मुक्त करे जो चबा चबा कर खाये
देख उदर में कोलाहल रोटी-
बासी हट जाती

- ऋता शेखर 'मधु'
१ अप्रैल २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter