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        आहट द्वारे फागुन की

 
अम्बर ने भेजी है आज भीनी खुशबू चन्दन की
सुनी धरा ने धीमी-धीमी आहट
द्वारे पाहुन की

चैत माह आ खड़ा देहरी गीत उत्सवी गूँज रहे
खेतों में खलिहानों में लो अंकुर अँखियाँ खोल रहे
कोई छेड़े फाग सुरीली बजी
घंटियाँ धड़कन की

धरती ओढ़े पीत चुनरिया धूप सुनहरी गले मिली
सूरज देवा दूर से देखें झूमे सरसों खिली खिली
पनघट पर फिर छनक गयी है
छनछन चूड़ी कंगन की

वन उपवन में सजी झालरें टेसू-महुआ पुष्प लड़ी
बौराये से आम बगीची कचनारों की लगी झड़ी
सजी सजीली धरती जैसे डोली
सजती दुल्हन की
सुन ली आहट पाहुन की

- शशि पाधा
१ अप्रैल २०२६

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