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        बौराई अमराई

 
मातृत्व की पुलक संजोए
हरित ये अमराई

चैत लगा तो वृक्ष अनेकों
लगे त्यागने पात
तपन बढ़ी, उष्मित प्रहार से
निष्क्रिय सबके गात
अमराई ने किन्तु निभायी
ग्रीष्म से कुड़माई

आपस में करता कनबतियाँ
आम्र- वृक्ष सौहार्द्र
मिला जड़ों से जीवन- रस तो
हृदय हो गया आर्द्र
कुसुमित होने लगी आस जब
टहनियाँ बौराईं

उर्वरता की पीड़ा मधुरिम
जननी का शृंगार
अमिया झूले मुदित मनः से
और झुलाए डार
मन आह्लादित, प्रसव गंध से
महकती पुरवाई

आत्मतुष्टि में निहित सर्वदा
दान धर्म का धैर्य
फल पाता वह, जो रखता है
पीर सघन में स्थैर्य
विनम्रता से डाल झुके तो
छाँव दे सुखदाई

- सुधा राठौर
१ अप्रैल २०२६

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