अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

        नवल वर्ष का चैत मास

 
नवल वर्ष का चैत मास फिर से मुस्काया है
रंग बिरंगा मौसम संग
अपने ले आया है

मंद-मंद मादक पुरवाई अविरल बहती है
धरती के हर अंग-अंग को पुलकित करती है
सूरज ने भी चढ़कर नभ में
उसे सजाया है

रंगों की रंगत जन-जीवन में फिर छायी है
पुष्प खिलें वन-उपवन धरती फिर मुसकायी है
खत्म हुई शीतलता मौसम
भी गरमाया है

फुदक-फुदक डालों पर कोयल फाग सुनाती है
चहक-चहक बागों में बुलबुल चैती गाती है
इन रागों ने मौस को फिर
से हुलसाया है

- दिनेश यादव
१ अप्रैल २०२१

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter