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        गर्मियों की ये दोपहरी

 

तेज़ तीखी तिलमिलाती गर्मियों की ये दोपहरी
बादलों से कब है हारी गर्मियों की ये दोपहरी

पेड़ पौधे घास गमले फिर से मुरझाने लगे हैं
क्या करे छाया बिचारी गर्मियों की ये दोपहरी

तुम न आए, आ गया सूरज सरों पे आँख मलता
साथ है किस्मत की मारी गर्मियों की ये दोपहरी

फिर कहाँ तुमको मिलेगा सर पे ये सूरज पिघलता
उफ़ खुदा की दस्तकारी गर्मियों की ये दोपहरी

फालसे तरबूज़ मीठे आम ले कर आ गयी है
आज पैसे कल उधारी गर्मियों की ये दोपहरी

तू नहीं आई अँधेरा छा गया सूनी गली में
तू जो रूठी मुझसे रूठी गर्मियों की ये दोपहरी

खींच के मारा किसी ने आसमाँ पे आज पत्थर
सुबह की डाली से टूटी गर्मियों की ये दोपहरी

- दिगंबर नसवा
१ जुलाई २०२६

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