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        सूरज सिर पर

 

विकल हवा बहने लगी छू आगी की देह
रह रह कर अकुला उठे सुप्त अचेतन नेह

मंजु हँसी मुस्काने का दाहक कैसा रूप
बार-बार पूछे धरा चुप्पी साधे धूप

सूरज सिर पर आ गया बंद हुए सब सैन
सूनेपन को अधिक करे दोपहरी बेचैन

पर्वत जैसे आग के सुबह दोपहर शाम
तन मन जैसे चटखते कैसे हो कुछ काम

तनिक धरा क्या झुक गई रवि तोड़े अनुबंध
जीव जंतु व्याकुल कहें कैसा यह संबंध

- निर्मला जोशी
१ जुलाई २०२६

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