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        तीन मुक्तक

 
१
धूपों ने शहर भर में अंगार बो दिए
सड़कों ने पाँव वाले अधिकार खो दिए
छाँवों का हाल पूछा भय से सिमट गए
पेड़ों के ज़ख्म देख वो हर बार रो दिए

२
प्यासे खेत, परिंदे प्यासे, प्यासे बहुत हैं लोग
आसमान से बरस रहा है आग लगा ये रोग
बादल नहीं दीखते हैं जो राहत मिले जरा
अख़बारों में रोज छप रहा सिर्फ चुनावी योग

३
ताप बढ़ा, वसुधा झुलसी, जग जीव छिपे रवि के डर से अब,
सूख गए सब कूप तड़ाग, नदिया, नहरें जल को तरसे अब।
पूछ रही धरती नभ से, कित मेघ छिपे, कब से बरसे जल,
झूम उठे नर नारि सभी, बरसे बरखा, धरती सरसे तब।

- प्रगति शंकर
१ जुलाई २०२६

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