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        गरमागरम बयार

 

गरमी आयी चढ़ गया सूर्य ताड़ के पार
खिलते ही दिन चल पड़ी गरमा गरम बयार

आसमान से इस तरह बरस रही है आग
जैसे सूरज को नहीं धरती से अनुराग

सूरज के तेवर चढ़े हुआ क्रोध में लाल
पशु-पक्षी व्याकुल फिरें सूख गए सब ताल

हाड़ कँपाती ठंड हो या झुलसाती धूप
मानव के हित में सदा कुदरत का हर रूप

जनजीवन व्याकुल हुआ झुलस रहे हैं बाग
आसमान से आजकल बरस रही है आग

बहा रहे हैं रात-दिन रोज पसीना-खून
मज़दूरों के भाग्य में बस है रोटी-नून

मौसम ने फिर कर दिया जन-जन को बेहाल
नभ से बरसी आग तो सूख गए सब ताल

बारिश तो आयी नहीं बढ़ी ग्रीष्म की मार
बोझिल मौसम कर रहा दिनचर्या पर वार

सर्दी का मौसम रहे या गरमी-बरसात
राम-राम करते कटें निर्धन के दिन-रात

इस गर्मी में कीजिए एक पुण्य का काम
कुछ जल घर में राखिए उन प्यासों के नाम

- सुबोध श्रीवास्तव
१ जुलाई २०२६

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