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        दोहा मुक्तक गर्मी

 
१
आग बरसती व्योम से लू में तपे बयार
तन झुलसे सीकर झरे शक्ति हुई है खार
पस्त हुआ है हौसला थका हुआ तन प्राण-
कैसे पूरे कर्म हों गर्मी करे प्रहार

२
सूखे पल्लव झड़ लिए कोमल पर्ण सुगात
छाया ढूंढें हैं पथिक ग्रीष्म काल की घात
शीत छुपी है छांव में लू का विकट प्रकोप -
जीना दूभर हो गया आग उगलती रात

३
तपती धरती मांगती बादल से अनुराग
श्याम जलद बरसें सघन जीवन खेले फाग
शुष्क हुए कण अग्नि से विकल हो रही वात-
लगें थपेड़े धूप में दुबके प्राणी जाग

- सुधा अहलुवालिया
१ जुलाई २०२६

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