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        बरसे तीखी आग
                    (कुंडलिया)

 
१
धरती अब अंगार है बरसे तीखी आग
सूखे पोखर खेत वन मुरझाये सब बाग
मुरझाये सब बाग पवन तन-मन झुलसाए
पशु पंछी सब त्रस्त प्यास अब कौन बुझाए
कह सुशील कविराय आग सूरज से झरती
जलते हैं दिन रात तपन से व्याकुल धरती

२
गर्मी ऐसी पड़ रही गिरें गगन अंगार
प्यारी धरती झेलती लू के तीखे वार
लू के तीखे वार नगर सुनसान पड़े हैं
लू लपटों के बीच वृक्ष सब मौन खड़े हैं
मानव पशु सब त्रस्त सूर्य की है हठधर्मी
असहनीय इस बार जेठ की तीखी गर्मी

३
गर्मी पागल कर रही तन पर बरसे शूल
छत आँगन तपने लगे सूख गए सब फूल
सूख गए सब फूल लपट अब खूब डराती
दूध दही जल छाछ बर्फ ठंडाई लाती
बचो धूप से आप दिखाओ मत हठधर्मी
कूलर ऐ सी साथ काटिए मौसम गर्मी

४
धरती प्यासी हो रही सूखी नदिया धार
तपती लू के सामने कूलर भी बेकार
कूलर भी बेकार पवन अंगार उगलती
पशु पक्षी बेहाल धूप विष जैसी लगती
कह सुशील कविराय गाय तिल-तिल कर मरती
वृक्ष लगाओ आप बचेगी तब ये धरती

- सुशील शर्मा
१ जुलाई २०२६

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