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        महलों में ऐसे झरोखे नहीं

 

बचपन का जो घर आँगन था
कहीं भीतर वो अब भी अंकित
मीठी मीठी उन यादों से
हृदय अब तक होता झंकृत

जो वृक्ष हमारे आँगन में
सूखे पत्ते फैला देता
वही ग्रीष्म की तपती दोपहरी में
हौले से हमें सहला देता

छोटी गौरैया भोर में जब
जरा डाल पे आके चहक देती
निंदिया रानी नयनों को छोड़
तब अपनी राह को चल देती
एक सोंधी मिट्टी की हंडिया
माँ भरकर रख आती पानी
और बिखेर आती कुछ दाने
चुग्गा खाए चिड़िया रानी
पंछियों के कलरव से फिर तो
गुलजार जो अपनी छत होती
माँ मुस्का के वहाँ झाँकती थी
अँखियों में खुशी के भर मोती

ढली साँझ बाल्टी भर भरकर
बाबू जी का छत को धोना
फिर बिस्तर वहीं लगाकर के
परिवार का छत पर ही सोना

बरगद के सोंधे पत्ते पर
मक्खन मलाई बिकने आती
हम साँकल खोल दौड़ जाते
आवाज गली में जो आ जाती
कंक्रीट भरे इस जंगल में
खो गए वो सभी नजारे हैं
पारा जो दिनों दिन चढ़ता है
दोषी इसके हम सारे हैं

वातानुकूलित इन कमरों में
कहीं ताजी बयार के झोंके नहीं
गौरैया आकर बैठ सके
इन महलों में ऐसे झरोखे नहीं

- अर्चना सक्सेना
१ जुलाई २०२६

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