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        सागर तट पर

 

उदासी में घिरा आकाश
मौसम गर्मियों का

पक्षियों के झुंड का नामोनिशा नहीं
पत्तियों से छूटते हैं स्वेद कण
शांत जल है जलन से
श्रांत लहरें सो गयीं थककर
तट सुलगती रेत में विह्वल

दूर तक बिखरी हुई
ये दोपहर खामोशियों की
न कोई आ रहा दिखता न कोई जा रहा है
नहीं हैं वे लोग जो इस तट पे आँखें सेंकते हैं
रूप के रूपायनों के ठिकाने
भी तो नहीं हैं
जो भीड़ों में गुँजा देते हैं धरती औ गगन को
वो प्यारे झुंड बच्चों के न जाने हैं कहाँ पर
गैंद, बाजे, रेत के घर, चाट, चुस्की
कुछ नहीं है- कुछ नहीं है
एक छतरी और उसकी एक छाया
बात करते हैं किसी एकांत की चुपचाप ऐसे
कि जैसे बस यही है समय
दिल की बात कहने का
हवा के साथ बहने का
धूप सर्दी में हमेशा साथ रहने का
लोग आए और गए
कितने न जाने
साथ लेकिन अब तलक इनका
किसी आशीष-सा ठहरा हुआ है

शाम होने दो जरा
यह तट सजेगा
रौनकों का एक झरना सा बहेगा
दिपदिपाते बल्ब, खोमचे, रहडियाँ
खिलखिलाते लोग ऊँट घोड़े बगघियाँ
शोर, मनरंजन, खुशी, उत्साह जाएगा गगन तक
दोपहर की ये उदासी चल पड़ेगी अपने घर को

बस इस समय जब गर्मियाँ हैं
सुस्तियों में डूबता यह तट अकेला
दोपहर के समय कुछ निष्काम दिखता है

- पूर्णिमा वर्मन
१ जुलाई २०२६

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