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        जेठ की प्यास

 

धूप उगलती आग गगन से,
सूखे कुएँ उदास
प्यास नदी की, फटी हथेली,
सूख गई है घास

माथे पर मटकों का सूरज,
पांवों में छाले
दो-दो कोस जल की खातिर
चलते दिन काले
बस्ती-बस्ती रीत गया है
बरखा का विश्वास
खाली घड़ों में गूँज रही है
भूखे जल की प्यास

गोद में बच्चा आँखों में मरुथल,
सिर पर जल का भार
चलते-चलते धूप निगलती
रंगों का संसार
सूख गए हैं ताल-तलैया,
रीते सब निर्झर
पेड़ों की शाखों पर बैठा मौन बंजर

राजपथों पर भाषण बरसे,
वादों की बौछार
किन्तु गांव के सूखे अधरों
तक न पहुँची धार

धरती माँ की नीली चूनर
तार-तार हो गई
लोभ-लिप्सा की अंधी आँधी
नदियों पर सो गई
फिर भी मन में एक मेघ का
दीपक जलता है
शायद सावन किसी मोड़ पर
फिर से मिलता है

- संजय सुजय बासल
१ जुलाई २०२६

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