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गाँव में अलाव
जाड़े की कविताओं को संकलन

गाँव में अलाव संकलन

हिमपात

फिर शीत लहर उठी है
दूर दूर तक बरफ गिरी है
चाँदी सी परतें
चमकती है पन्नियों सी
झर झर के बरसते हैं
कास कुसुम आकाश से
धुनी जाती रूई के से काहे
टूटती लड़ियों से बिखरते हैं
हर ओर दुग्ध झाग सा बगरा है
सामने की सड़क पूरी
ढँक गयी है बर्फ से
सब कुछ सुनसान है।
1

मोड़ पर बर्फ से ढँका घर
पहाड़ी बँगले सा ही दिखता है
जहाँ से सैलानियों के जोड़े
खिलौने से लगते थे
लगता है आज भी तुम
उस आदमकद खिड़की से सटी हुई
एकटक दूर तक फैली
सफेदी को निहारती होगीं
एकदम गुमसुम
अपने में ही खोयी सी।
1

चटक चटक कर लपटें
फायर प्लेस में ऊँची उठती है
काँच की चौखटी खिड़की पर मैं
सिर धरे सुकून से बैठा हूँ
बार बार वहम होता है
अचानक याद आ गई तुम्हें
अगर तन्द्रा भंग होने पर
तो ऐसे ही बिना ऊनी कपड़ों के
इस कड़ाके की ठंड में
पत्ते सी काँपती
आ खड़ी होगी द्वार पर।
1

-डॉ राम गुप्ता बैरिटन रोड आयलैण्ड

   शरद की दोपहर

जब मैंने मिसरी का व्यवहार
चीनी से भिन्न देखा
मैं समझ गया था
रूप त्वचा से कहीं गहरा है
वह बदल देता है तासीर
मिठास की
1
जब मैंने सीखना शुरू किया था
शब्दों के अर्थ
मैं बहुत खुश रहता था
मैं समझता था
पहचानने लगा हूँ शब्द
किन्तु जब कितने ही जहाज़ों को
सागर में
हिमशिलाओं से टकरा कर
चूर चूर होते देखा
तब ही मैंने शुरू कर दिया था
होना सावधान
1
किन्तु अब तो देखता हूँ
विचारों के सागर में
बिछाया जाता है शब्द
हिमशिलाई सुरंग की तरह
खूब घमासान
1
औरों की मैं क्या कहूँ
गंगा का भी बदल गया है रूप
अब वह भागीरथी
लाती है रेत और पत्थर
1
अब तो मौसम भी हो गया है
इतना ठंडा
कि जला कर अंगीठी
सेकता रहता हूँ
नारंगी लपटों की आँच
1
आध्यान में रहता हूँ
जब तुम क्रोध करती थीं
चढ़ जाती थी
शरद की दोपहर
जब मुस्कराती थीं
बरस जाती थी
शरद की पूनो
और जब हँसती थीं
तब खिल जाते थे
चम्पा के लाल फूल
1
क्या करूँ!!
रूप टिक गया है
त्वचा पर
शब्द हिमशिला पर!!
1
- विश्वमोहन तिवारी

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