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गाँव में अलाव
जाड़े की कविताओं को संकलन

गाँव में अलाव संकलन

जाडे में पहाड

फिर हिमालय की अटारी पर
उतर आये हैं परेवा मेघ
हंस-जैसे श्वेत
भींगे पंखवाले।
दूर पर्वत पार से मुझको
है बुलाता-सा पहाड़ी राग
गरम रखने के लिए बाकी
रह गयी बस कांगड़ी की आग
ओढ़कर बैठे सभी ऊँचे शिखर
बहुत महँगी धूप के ऊनी दुशाले।

मौत का आतंक फैलाती हवा
दे गयी दस्तक किवाड़ों पर
वे जिन्हें था प्यार झरनों से
अब नहीं दिखते पहाड़ों पर
रात कैसी सरद बीती है
कह रहे किस्से सभी सूने शिवाले।

कभी दावानल, कभी हिमपात
पड़ गया नीला वनों का रंग
दब गये उन लड़कियों के गीत
चिप्पियोंवाली छतों के संग
लोक रंगों में खिले सब फूल
बन गये खूँखार पशुओं के निवाले।

- डॉ बुद्धिनाथ मिश्र

  

केवल हिम

हिम, केवल हिम-
अपने शिव:रूप में
हिम ही हिम अब!
रग-गंध सब परित्याग कर
भोजपत्रवत हिमाच्छादित
वनस्पति से हीन
धरित्री-
स्वयं तपस्या।
पता नहीं
किस इतिहास-प्रतीक्षा में
यहाँ शताब्दियाँ भी लेटी हैं
हिम थुल्म़ों में।
शिवा की गौर-प्रलम्ब भुजाओं-सी
पर्वत-मालाएँ
नभ के नील पटल पर
पृथिवी-सूक्त लिख रहीं।
नीलमवर्णी नभ के
इस ब्रह्माण्ड-सिन्धु में
हिम का राशिभूत
यह ज्वार
शिखर, प्रतिशिखर
गगनाकुल।

याक सरीखे
धर्मवृषभ इस हिम प्रदेश में

- नरेश मेहता

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