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गाँव में अलाव
जाड़े की कविताओं को संकलन

 

गाँव में अलाव संकलन

हिम नहीं यह

          हिम-जलद, हिम-श्रृंग
हिम-छवि,
हिम-दिवस, हिम-रात,
हिम-पुलिन, हिम-पन्थ;
हिम-तरू,
हिम-क्षितिज, हिम-पात।

आँख ने
हिम-रूप को
जी-भर सहा है।
सब कहीं हिम है
मगर मन में अभी तक
स्पन्दनों का
उष्ण-जलवाही विभामय स्त्रोत
अविरल बह रहा है

हिम नहीं यह -
इन मनस्वी पत्थरों पर
निष्कलुष हो
जम गया सौन्दर्य।

यह हिमानी भी नहीं -
शान्त घाटी में
पिघल कर बह रही
अविराम पावनता।

और यह सरिता कि जैसे
स्नेह का उद्दाम कोमल पाश
अनगिनत प्रतिबिम्ब रच कर
बाँधती हो भूमि से आकाश।

- डॉ जगदीश गुप्त

   धूप का टुकड़ा

जाड़े के दिनों में
धूप का एक टुकड़ा
आता है मेरे आंगन में
नटखट बच्चे-सा।
एक कोने से
दूसरे कोने तक,
रेशमी वस्त्र-सा
सरकता हुआ,
दौड़ाता है!
खिजाता है!
सुखाने को डाली गयी
चीजों को सरकाते,
ठंड से ठिठुरी
देह को गरमाते,
सुबह से शाम तक
थका डालता है
वह नटखट
धूप का टुकड़ा।

-राधा जनार्दन

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