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गाँव में अलाव
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गाँव में अलाव संकलन

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उज्जवल शीतल
भर जाता है
कौन शिशिर में रंग,
वर्षा की नन्हीं बूँदों को
कोमल कपास-सा
कौन सजाता?
शीतल प्रकाशमय
बोलो उजले घन।


दु:ख में हमने
न सीखा रिसना,
न शीतों में कम्पन।
गीली पलकों से बरसाया
पुष्पों-सा हँस-हँस
मैं हूँ तुहिन कण


अंधियारे में मार्ग दिखाते
दे चन्दा को आराम,
और चाँदनी रातें हमसे
चन्दा है हैरान।


फूलों से चट्टाने बनना
हम से सीखो तुम,
दब कर कभी न रहना,
न निराश होना,
चट्टाने तुम बनना।


स्की हो या स्केटिंग,
सँभल-सँभल कर
नहीं चले जो
उन्हें फिसलना गिरना
मिलकर सब रहना।
जो गर्म हृदय हो
गर्म हवा हो
सहृदय तुम्हे अपनाये
तुम मुझ बर्फीली चट्टानों-सा,
लघु नदी बन
झर-झर बहना।

- शरद आलोक

 
 

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