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गाँव में अलाव
जाड़े की कविताओं को संकलन

गाँव में अलाव संकलन

जाडे की धूप

बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया

ताते जल नहा पहन श्वेत वसन आयी
खुले लान बैठ गयी दमकती लुनायी
सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

नभ के उद्यान-छत्र तले मेज : टीला,
पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला,
वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

पैरों में मखमल की जूती-सी-क्यारी,
मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी,
डोलती सलाई हिलता जल लहराया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

बोली कुछ नहीं, एक कुर्सी की खाली,
हाथ बढ़ा छज्जे की साया सरकाली,
बाँह छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

 

मेरा सूरज

दिसम्बर की सर्द रात
मैं तुम और ये सन्नाटा
कब ये कोहरा
बिस्तर पर अचानक उतर आया
न तुम समझ सके
न मैं समझ पाया
न ये ज़ुबान अब कुछ बोलती है
और न
रिश्तों की गरमाहट
इस ठंड को रोकती है
अपने अपने कोने में सिमटे हुए
एक ही कंबल में लिपटे हुए
हम अपनी अपनी
गरमाहट को खोजते हैं
कभी तो
ये लंबी सर्द रात ख़त्म होगी
उजाला फूटेगा
और ये कोहरा भाग छूटेगा
वर्षो से
बर्फ से रिसती ज़िन्दगी़ पिघलेगी
नव कोपले फूटेंगी
और दिसम्बर की सर्द रात मे
मेरा भी सूरज चमकेगा

- शिवि

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