अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

गंगा का वरदान

 

 
कठिन तपस्या से मिला, गंगा का वरदान।
मोक्ष सगर सुत पा गए, पाया श्राप निदान।
पाया श्राप निदान, तारने सुरसरि आई,
युगों युगों से पाप, मनुज के हरती माई।
पर्व- तीज में स्नान, नष्ट हो सभी समस्या,
अर्जित करता पुण्य, बिन किए कठिन तपस्या। .

तीरथ गंगा तट बसे, बने मोक्ष के धाम।
पाप कलुष सब के हरे, बिना दिए कुछ दाम।
बिना दिए कुछ दाम, सभी के कष्ट निवारे,
पूजा तर्पण याग, अधूरे जल बिन सारे।
करे मनोरथ पूर, भेंट दे गए भगीरथ,
ऐसा देश महान, यहाँ हर तट पर तीरथ।

गंगा केवल नाम ही, भारत की पहचान।
संस्कृति और समाज की, यही आन औ शान।
यही आन औ शान, सभी ने महिमा गाई,
तारण हित अवतरण, सभी की प्यास बुझाई।
शमन करे सब व्याधि, दुखों से करती चंगा,
खेतों को जल सींच, अन्न से भरती गंगा।

-ज्योतिर्मयी पंत
१७ जून २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter