अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

गंगा की संध्या आरती

 

 
एक साथ
अनगिन हाथ
हिलते हैं हवा में
कपूर धूप घी की खुशबू से भीगी
झिलमिलाहट की शक्ल में
और एक धुंध-सी छँटने लगती है
कहीं भीतर दूर दूर तक

एक साथ
गूँजते हैं अनगिन स्वर
निश्चित लय और ताल में उठते गिरते
सहसा, एक चँदोवा सा
तन जाता है मेरे अस्तित्व पर

पास ही कहीं आश्वस्ति की
पदचाप सुनाई पड़ने लगती है
शंख, घंट, घड़ियाल की शक्ल में
रंग बिरंगी पंखुरियाँ-सी झरने लगती हैं
एक साथ

जादूगर के इंद्रजाल की तरह
झीने पर्दे को हटाकर
हाजिर हो जाता है
अचानक
एक सामूहिक जयघोष
और मैं पलक झपकते ही
किसी अन्य संसार में पहुँच जाती हूँ

- मृदुल जोशी
१७ जून २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter