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किस तरह गंगा बहेगी

 


 
मार्ग है अपवित्र सारे
किस तरह गंगा बहेगी

सभ्यता का बोझ ढोती
आज तटिनी थक चुकी है
बेसुरे आश्वासनोँ से
त्रस्त जल की रागिनी है

बढ़ रहे आघात निशिदिन
किस तरह गंगा सहेगी

लुप्त होती जा रही है
कर्णप्रिय कलकल ध्वनी
गंदगी के ढेर से है
आज सब नदियाँ सनी

घुटन के घन आवरण मेँ
धड़कनें कब तक चलेंगी

सांत्वना के छद्म हैं स्वर
राहतेँ किसको मिलेंगी
स्वार्थ की विषबेल पर यूँ
चाहतेँ कैसे फलेंगी

हम न सँभले तो, माँ गंगा
अलविदा हो कर रहेगी

आज भौतिक स्वार्थ सारे
राख कर अपने बहा दो
और नैतिक शुभ्र ध्वज को
राष्ट्र के नभ मेँ फहरा दो

कर्मपथ पर सब बढ़ें तो
सुरसरि भी बह चलेगी

-सुरेन्द्रपाल वैद्य
१७ जून २०१३

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