अंजुमनउपहार काव्य संगम  गीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथ
दोहेसंकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर

हर हर गंगे





 

हर-हर गंगे, हर-हर गंगे

कैसे उऋण हो
ऋण से तुम्हारे
ये संसार, हे! माँ गंगे

हुई वसुंधरा पावन तुमसे
हरे सकल पाप,
तुमने हर जन के
पतित पावनी, आनंद दायिनी
सगर पुत्र तारिणी,
भागीरथी
किस नाम से पुकारें माँ हम तुमको ?

जीवन
धन्य हुआ हमारा
पाकर पावन स्पर्श तुम्हारा
तुम्हारे अंश से ही गणपति
कहलाते हैं
विघ्नविनाशक
धुल जाते हैं पाप सभी के
तुम्हारे पावन अंक में आकर
जय जयकार करे
जगत तुम्हारा
हर-हर गंगे, हर-हर गंगे

-विक्रम सिंह
४ जून २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter