अंजुमनउपहार काव्य संगम  गीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथ
दोहेसंकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर

नित्य वाहिनी माँ गंगा





 

तू विरंचि की धन थी गंगे
आ शिव जूट समायी थी
धन्य हुई थी यह धरित्री
बन मोक्ष दायिनी आई थी

हिम शैल सुता पावन धारा
सघन विपिन के बीच बही
ऋषि मुनियों की सिद्ध सूत्र
बन गए तीर्थ तू जहाँ रही

थी सुरसरि बहती ले प्रवाह
मोहे कल- कल तेरा निनाद
बस एक आचमन दे जाता
अनगिनती पुण्यों का प्रसाद

मिलते हैं गरल स्रोत आ-आ
करते हैं उपद्रव मनचाहे
हाय! मनुज क्या कर बैठा
गंगा स्वयं मोक्ष को चाहे

-अनिल कुमार मिश्रा
४ जून २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter