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होली है!!

 

गुलाल के छींटे
(पाँच क्षणिकाएँ)


१
गुलाल के छींटें
जो बिखेरे थे कभी राहों में
मेरा फागुन
आज भी महका जाते हैं
छूते हैं हौले से मुझे
मन चन्दन हो जाता है ।

२
प्रेम की उस
पहली होली में
तुमने चुपके से
डाला था बालों में रंग
आज भी जब भीगते हैं गेसू
पानी गुलाबी हो जाता है

३
रंग तुम्हारे
चुपचाप मेरे जीवन में
चले आते हैं,
बेनूर चूनर पर
बरस
मुझ में समा जाते हैं
मै सतरंगी हो जाती हूँ

४
रंग पर चढ़ कर
शब्द तुम्हारे
गलियारे में उधम मचाते हैं ,
रात ड्योढ़ी पर
औंधे मुँह सो जाते हैं
फींके सपने मेरे
इन्द्रधनुषी हो जाते हैं

५
बचा सबकी नज़र
मुझ पर फेंका
प्रेम- रंग
उसका अभ्रक
चुभता है आज भी आँखों में
हर होली आँखें बरस जाती हैं

रचना श्रीवास्तव
२१ मार्च २०११

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