अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

होली है

 

रंगों की बौछारें

पड़ीं रंगों की बौछारें सब सखियाँ डोल गयीं
लाज के सारे पहरे देखो
पल में खोल गयीं

भर पिचकारी
मार रहे हैं, सखा सभी मिल जुलकर
काले नीले पीले चहरे, रंग हाथ में भर कर
लगा रहे इक दूजे पर सब हँसी ठिठोली करके
आँखों में पतवार नेह की
नौका पर चढ़ चढ़कर

पाँव थिरकने लगे
कि झांझर संग में बोल गयीं

कैसा ये मौसम
है जिसमें झर गये पीले-पात
होली का उत्सव है लाया नेह रंगीले प्रात
रंग भरे सपने हैं आये रंग भरी मनुहारें
झूम रहे हैं सब नर नारी
हो गये ढीले गात

याद पिया की
आकर नयनों को अनमोल गयीं

गीता पंडित
५ मार्च २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter