अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

रंगों का त्यौहार

खुशियाँ मिलीं, गले मिले हैं, प्यार देखिये
रंगों का फिर से आ गया त्योहार देखिये

आवाज दे रहे हैं स्वर में गीत फागुनी
ढोलक की थाप, झाँझ की झंकार देखिये

ढेरों खुशी लुटा रहे उपहार की तरह
सम्बन्ध पर भी रंग का उपकार देखिये

मिलकर के रंग-रंग से ऐसा गजब किया
बैठा हुआ हूँ किस कदर लाचार देखिये

मतभेद भूलकर सभी आपस में मिल रहे
गिरने लगी है द्वेष की दीवार देखिये

नफरत, विरोध, साजिशें, तकरार छोड़कर
कैसे बढ़े विकास की रफ़्तार देखिये

सहमी हुई सद्भावना, नफरत की चोट से
घायल हुई है रोज़ का अख़बार देखिये

जमकर लगा रहा है इक तूफ़ान कहकहा
छूटे न हाथ से कहीं पतवार देखिये

- कृष्ण कुमार तिवारी
१५ मार्च २०१६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter