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तन रंग दे आ मन रंग दे

गमके आज द्वार औ आँगन
मन में बोले होरी है।

चाहत के सरगम से छमछम
करती हर इक ओर लगे,
तेरी आहट की खुशबू से
गमगम पोरे पोर लगे,
टूट रहा संयम का पहरा
ये कैसी बरजोरी है

बौराए है तन तरुवर
मन कुमकुम रंग अबीर लगे
आस मिलन की संजोए
दो अँखियाँ जमुना तीर लगे
धक धक डोले जिया कि जैसे
व्याकुल राधा गोरी है

सच बतलाऊँ साजन तुझसे
जबसे आँखे चार हुईं
तेरे परसन के उबटन से
मन कलियाँ गुलजार हुईं
बेकाबू सी आज हुई
लगती साँसों की डोरी है।

लाज न आए खोले दिल ने
राज पिकी हरजाई के
मीठा मीठा टीस जगे
छूते पागल पुरवाई के
हौले रंग उड़ाओ साजन
उमर अभी तो कोरी है।

- शंभुशरण मंडल
१ मार्च २०१७

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