अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

सखे दिन होरी के

सुनहरी सुबह, रुपहली धूप
सुरमयी साँझ निखारे रूप
सखे, दिन होरी के

कहीं पर चहचर, फाग, धमार
कोई बरसाये रंग गुलाल
रंगी या कोरी के
सखे, दिन होरी के

छेड़कर अ-र-र-र कहें कबीर
लगाएँ मल-मल रंग अबीर
साँवरी गोरी के
सखे, दिन होरी के

स-र-र-सर टेसू रंग बौछार
गाँव, घर, गलियाँ औ' चौबार
रंगे रंग होरी के
सखे, दिन होरी के

- अनिल कुमार वर्मा
१ मार्च २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter