अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

ऐसा फेंका रंग

ऐसा फेंका रंग
कि केसर-केसर गगन हुआ
तनमन भीगा भीगा फागुन
मन सतरंग हुआ

बढ़े समंदर कोलाहल के
नाच उठे मन-मोर
तार स्वरों में फाग गूँजता
जिसका ओर न छोर
ऐसी बाजी चंग
कि सरगम-सरगम मगन हुआ
तनमन भीगा, भीगा फागुन
मन सतरंग हुआ

मित्र-मंडली, आवाजाही
किस्सागोई की
धीरे धीरे सीझ रही है
गमक रसोई की
ऐसे मिले स्वजन
कि आनंद आनंद भुवन हुआ
तनमन भीगा, भीगा फागुन
मन सतरंग हुआ  

इत्र फुलेल अबीर, अबरक से
रंग रंगीले हैं
औ' गुलाबपाशों को थामे
सजे सजीले हैं
ऐसी उड़ी सुगंध
कि चंदन-चंदन पवन हुआ
तनमन भीगा, भीगा फागुन
मन सतरंग हुआ

सालों साल चले यह मौसम
खुशियाँ साथ रहे
सारे पकवानों के संग में
गुझियाँ साथ रहें
सुख की उड़े पतंग
कि ज्यों उपवन में मस्त सुआ
तनमन भीगे, भीगे फागुन
सबको यही दुआ

- पूर्णिमा वर्मन
१ मार्च २०२०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter