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इन्द्रधनुष मन हो गया

याद किया जब नदी ने कल झरने का जश्न
फागुन की अठखेलियाँ छोड़ गयीं कुछ प्रश्न

अब तो केवल रतजगा एक उसी के ख़्वाब
फागुन आया दे गया गुझिया और गुलाब

काया चन्दन हो गयी मन टेसू का फूल
फागुन आया रंग गया कालिन्दी के कूल

बातें करते रात-दिन मिलते दृष्टि सँभाल
फागुन करता पैरवी जब से पड़ा गुलाल

प्रणय-निवेदन अवनि का अम्बर है निरुपाय
फागुन अबकी गढ़ रहा नये-नये अध्याय

कहकर हाँ शरमा गयी फागुन करे कमाल
काट चिकोटी गाल में मलता रहा गुलाल

मिले और फिर हो गये कस्तूरी का इत्र
फागुन की रंगीनियाँ दिखा रहीं नवचित्र

इन्द्रधनुष मन हो गया चले काम के बाण
फागुन जादू कर रहा मोम हुआ पाषाण

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
१ मार्च २०२२
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