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        रंगों की जलधारा

रंगों की जलधारा फूटे 
होली के हुड़दंगों से 
आओ दुनिया को रंग डालें
इंद्रधनुष के रंगों से

आस और विश्वास मिलाकर
अग्नि प्रेम की दहका दें
नफरत और निराशा पल में 
भस्म करें जग चमका दें
तंग आ चुका दिल का बच्चा 
रोज-रोज के पंगों से

वैमनस्य के भावों पर
मल दें केसर का पीलापन
रसमय हो इस कदर 
न सूखे फिर धरती का गीलापन
मानवता के मुख पर कालिख 
मलें न अब हम दंगों से

बजे शांति की धुन ऐसी 
नाचे आनंद मगन होकर
सूरज बाबा भी फेंकें 
रंगों की थाली धरती पर
भर जाए धरती का आँचल
प्रेमासक्त मलंगों से 

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह
१ मार्च २०२३
   

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