अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

   
 

      
        रंगों की जलधारा

रंगों की जलधारा फूटे 
होली के हुड़दंगों से 
आओ दुनिया को रंग डालें
इंद्रधनुष के रंगों से

आस और विश्वास मिलाकर
अग्नि प्रेम की दहका दें
नफरत और निराशा पल में 
भस्म करें जग चमका दें
तंग आ चुका दिल का बच्चा 
रोज-रोज के पंगों से

वैमनस्य के भावों पर
मल दें केसर का पीलापन
रसमय हो इस कदर 
न सूखे फिर धरती का गीलापन
मानवता के मुख पर कालिख 
मलें न अब हम दंगों से

बजे शांति की धुन ऐसी 
नाचे आनंद मगन होकर
सूरज बाबा भी फेंकें 
रंगों की थाली धरती पर
भर जाए धरती का आँचल
प्रेमासक्त मलंगों से 

- धर्मेन्द्र कुमार सिंह
१ मार्च २०२३
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter