अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

   
 

      
        रंगों का त्योहार

रंगों का त्योहार
फागुन खड़ा हमारे द्वार
होली आई है खुशियाँ लाई है

घर आँगन गुलज़ार
आपसी प्रेम, बढ़ाना प्यार
क़सम ये खाई है होली आई है

खेलेंगे हम संग
हाथ में ले गुलाल औ रंग
खुमारी छाई है होली आई है

छाया हुआ बसंत
बज रहा चारों तरफ मृदंग
संग शहनाई है होली आई है

लाना सबको संग
साथ सद्भावनाओं के रंग
मिटानी खाई है होली आई है

- जिज्ञासा सिंह
१ मार्च २०२३

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter