अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

   
 

      
        दिन फागुन के

लगे जिया नहिं बिन पाहुन के
लो! आये हैं दिन फागुन के

रंग-अबीरा चंदन-रोली
मौसम ने है मिसरी घोली
हवा वसंती सर सर डोले
बोल रही है होली होली

मचल रही है सभी दिशाएँ
हंसी ठहाके उनकी सुन के

भीगे चूनर गागर फूटे
कोई रूठे कोई छूटे
रंगों से हों सराबोर पर
मर्यादा के बंध न टूटे
रंगों के इस महापर्व में
सही रंग इक लें हम चुन के

पीर किसी की कुछ हरने दो
अपने मन का कुछ करने दो
टेसू से कुछ रंग चुराकर
प्रेम प्रीति का रंग भरने दो
सुनो कबीरा! झीनी मुझको
देना एक चदरिया बुन के

- श्रीधर आचार्य शील
१ मार्च २०२३
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter