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     होली
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रंग और पिचकारी
देखते ही
बचपन याद आ रहा है
बच्चों की धमाचौकड़ी
रंग और पानी
मन को लुभा रहा है

गली-गली
उड़ रहा है गुलाल
और हवा भी रंगीन हो रही है
भीगे सपनों की चुनरिया
जैसे फिर से नई हो रही है

टेसू के फूलों सा
रंगीन हो गया है आँगन
छोटे-छोटे हाथों में
जैसे खिल गया है बचपन
न कोई ऊँच नीच है न मन में दीवार
रंगों ने होली पर सबको
कर दिया है एकाकार

आज
वही पिचकारी
अलमारी में सोई पड़ी है
पर मन की कोरी दीवार
अब भी रंगों को ढूँढ रही है

चलो फिर से
भीग चलें रंगों की फुहारों में
उम्र को कुछ कम कर लें
उन मासूम बरसातों में

- संजय सुजय बासल
१ मार्च २०२६

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