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  उतर आया फागुन
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फूले हैं कचनार उतर आया फागुन
खोले पंख हजार उतर आया फागुन

हुई गुनगुनी धूप चढ़ा कुछ पारा है
किरणों ने सूरज का प्रेम पसारा है
छज्जे-छज्जे बढ़े गुलाबी पन्ने हैं
गुपचुप खींचे गए प्रेम के कन्ने हैं
देहरी आँगन द्वार
उतर आया फागुन

खेतों-खेतों आस उमग पियराई है
मेड़ों-मोड़ों मिलती दिखे मिताई है
शाख-शाख पर बौर आँख में डोरे हैं
जगे चाह के सपन कुँआरे कोरे हैं
सब पर मंतर मार
उतर आया फागुन

कुदरत ने क्या सोच रंग यह घोला है
दिशा-दशा में फागुन-फागुन रोला है
इसके चलते हर शोखी को पंख लगे
कैसा साहूकार सभी मन अचक ठगे
लेकर लाल बुखार
उतर आया फागुन
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- अनामिका सिंह
१ मार्च २०२६

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